गौएँ ही तो व्रजवासियोंकी जीविकाका साधन थीं। उनके न मिलनेसे वे अचेत-से हो रहे थे। अब वे गौओंके खुर और दाँतोंसे कटी हुई घास तथा पृथ्वीपर बने हुए खुरोंके चिह्नोंसे उनका पता लगाते हुए आगे बढ़े॥ ४॥
तृणैस्तत्खुरदच्छिन्नैर्गोष्पदैरंकितैर्गवाम् ।
मार्गमन्वगमन् सर्वे नष्टाजीव्या विचेतसः॥ ४
गौएँ ही तो व्रजवासियोंकी जीविकाका साधन थीं। उनके न मिलनेसे वे अचेत-से हो रहे थे। अब वे गौओंके खुर और दाँतोंसे कटी हुई घास तथा पृथ्वीपर बने हुए खुरोंके चिह्नोंसे उनका पता लगाते हुए आगे बढ़े॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.19.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 257) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/19/4/