बलरामजी परम बलशाली थे। जब ग्वालबालोंने देखा कि उन्होंने प्रलम्बासुरको मार डाला, तब उनके आश्चर्यकी सीमा न रही। वे बार-बार ‘वाह-वाह’ करने लगे॥ ३०॥
दृष्ट्वा प्रलम्बं निहतं बलेन बलशालिना।
गोपाः सुविस्मिता आसन् साधु साध्विति वादिनः॥ ३०
बलरामजी परम बलशाली थे। जब ग्वालबालोंने देखा कि उन्होंने प्रलम्बासुरको मार डाला, तब उनके आश्चर्यकी सीमा न रही। वे बार-बार ‘वाह-वाह’ करने लगे॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.18.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 256) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/18/30/