kvacid bilvaiḥ kvacit kumbhaiḥ kva cāmalakamuṣṭibhiḥ|
aspṛśyanetrabandhādyaiḥ kvacinmṛgakhagehayā|| 14
अर्थ
कभी एक-दूसरेपर बेल, जायफल या आँवलेके फल हाथमें लेकर फेंकते। कभी एक-दूसरेकी आँख बंद करके छिप जाते और वह पीछेसे ढूँढ़ता—इस प्रकार आँखमिचौनी खेलते। कभी एक-दूसरेको छूनेके लिये बहुत दूर-दूरतक दौड़ते रहते और कभी पशु-पक्षियोंकी चेष्टाओंका अनुकरण करते॥ १४॥✎ 1663
क्वचिद् बिल्वैः क्वचित् कुम्भैः क्व चामलकमुष्टिभिः।
अस्पृश्यनेत्रबन्धाद्यैः क्वचिन्मृगखगेहया॥ १४
कभी एक-दूसरेपर बेल, जायफल या आँवलेके फल हाथमें लेकर फेंकते। कभी एक-दूसरेकी आँख बंद करके छिप जाते और वह पीछेसे ढूँढ़ता—इस प्रकार आँखमिचौनी खेलते। कभी एक-दूसरेको छूनेके लिये बहुत दूर-दूरतक दौड़ते रहते और कभी पशु-पक्षियोंकी चेष्टाओंका अनुकरण करते॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.18.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 254) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/18/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)