श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.18.14

दशम स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

क्वचिद् बिल्वैः क्‍वचित् कुम्भैः क्व चामलकमुष्टिभिः।

अस्पृश्यनेत्रबन्धाद्यैः क्वचिन्मृगखगेहया॥ १४

kvacid bilvaiḥ kvacit kumbhaiḥ kva cāmalakamuṣṭibhiḥ|

aspṛśyanetrabandhādyaiḥ kvacinmṛgakhagehayā|| 14

अर्थ

कभी एक-दूसरेपर बेल, जायफल या आँवलेके फल हाथमें लेकर फेंकते। कभी एक-दूसरेकी आँख बंद करके छिप जाते और वह पीछेसे ढूँढ़ता—इस प्रकार आँखमिचौनी खेलते। कभी एक-दूसरेको छूनेके लिये बहुत दूर-दूरतक दौड़ते रहते और कभी पशु-पक्षियोंकी चेष्टाओंका अनुकरण करते॥ १४॥✎ 1663

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1663 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: बल-पर → बलपर

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