श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.17.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

स्वं स्वं भागं प्रयच्छन्ति नागाः पर्वणि पर्वणि।

गोपीथायात्मनः सर्वे सुपर्णाय महात्मने॥ ३

svaṃ svaṃ bhāgaṃ prayacchanti nāgāḥ parvaṇi parvaṇi|

gopīthāyātmanaḥ sarve suparṇāya mahātmane|| 3

अर्थ

इस नियमके अनुसार प्रत्येक अमावस्याको सारे सर्प अपनी रक्षाके लिये महात्मा गरुडजीको अपना-अपना भाग देते रहते थे*॥ ३॥

टिप्पणियाँ

  1. *

    यह कथा इस प्रकार है—गरुडजीकी माता विनता और सर्पोंकी माता कद्रूमें परस्पर वैर था। माताका वैर स्मरण कर गरुडजी जो सर्प मिलता उसीको खा जाते। इससे व्याकुल होकर सब सर्प ब्रह्माजीकी शरणमें गये। तब ब्रह्माजीने यह नियम कर दिया कि प्रत्येक अमावास्याको प्रत्येक सर्पपरिवार बारी-बारीसे गरुडजीको एक सर्पकी बलि दिया करे।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 249)

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