श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.17.14

दशम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

उपलभ्योत्थिताः सर्वे लब्धप्राणा इवासवः।

प्रमोदनिभृतात्मानो गोपाः प्रीत्याभिरेभिरे॥ १४

upalabhyotthitāḥ sarve labdhaprāṇā ivāsavaḥ|

pramodanibhṛtātmāno gopāḥ prītyābhirebhire|| 14

अर्थ

उनको देखकर सब-के-सब व्रजवासी इस प्रकार उठ खड़े हुए, जैसे प्राणोंको पाकर इन्द्रियाँ सचेत हो जाती हैं। सभी गोपोंका हृदय आनन्दसे भर गया। वे बड़े प्रेम और प्रसन्‍नतासे अपने कन्हैयाको हृदयसे लगाने लगे॥ १४॥

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