श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.16.66

दशम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

पूजयित्वा जगन्‍नाथं प्रसाद्य गरुडध्वजम्।

ततः प्रीतोऽभ्यनुज्ञातः परिक्रम्याभिवन्द्य तम्॥ ६६

pūjayitvā jagannāthaṃ prasādya garuḍadhvajam|

tataḥ prīto'bhyanujñātaḥ parikramyābhivandya tam|| 66

अर्थ

उन्होंने दिव्य वस्त्र, पुष्पमाला, मणि, बहुमूल्य आभूषण, दिव्य गन्ध, चन्दन और अति उत्तम कमलोंकी मालासे जगत‍्के स्वामी गरुडध्वज भगवान् श्रीकृष्णका पूजन करके उन्हें प्रसन्‍न किया। इसके बाद बड़े प्रेम और आनन्दसे उनकी परिक्रमा की, वन्दना की और उनसे अनुमति ली। तब अपनी पत्‍नियों, पुत्रों और बन्धु-बान्धवोंके साथ रमणक द्वीपकी, जो समुद्रमें सर्पोंके रहनेका एक स्थान है, यात्रा की। लीला-मनुष्य भगवान् श्रीकृष्णकी कृपासे यमुनाजीका जल केवल विषहीन ही नहीं, बल्कि उसी समय अमृतके समान मधुर हो गया॥ ६५—६७॥

यह अर्थ श्लोक 65–67 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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