॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.16.57
त्वया सृष्टमिदं विश्वं धातर्गुणविसर्जनम्।
नानास्वभाववीर्यौजोयोनिबीजाशयाकृति॥ ५७
tvayā sṛṣṭamidaṃ viśvaṃ dhātarguṇavisarjanam|
nānāsvabhāvavīryaujoyonibījāśayākṛti|| 57
अर्थ
विश्वविधाता! आपने ही गुणोंके भेदसे इस जगत्में नाना प्रकारके स्वभाव, वीर्य, बल, योनि, बीज, चित्त और आकृतियोंका निर्माण किया है॥ ५७॥