॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.16.42
भूतमात्रेन्द्रियप्राणमनोबुद्ध्याशयात्मने ।
त्रिगुणेनाभिमानेन गूढस्वात्मानुभूतये॥ ४२
bhūtamātrendriyaprāṇamanobuddhyāśayātmane |
triguṇenābhimānena gūḍhasvātmānubhūtaye|| 42
अर्थ
प्रभो! पंचभूत, उनकी तन्मात्राएँ, इन्द्रियाँ, प्राण, मन, बुद्धि और इन सबका खजाना चित्त—ये सब आप ही हैं। तीनों गुण और उनके कार्योंमें होनेवाले अभिमानके द्वारा आपने अपने साक्षात्कारको छिपा रखा है॥ ४२॥