श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.16.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

तं जिह्वया द्विशिखया परिलेलिहानं

द्वे सृक्किणी ह्यतिकरालविषाग्‍निदृष्टिम्।

क्रीडन्‍नमुं परिससार यथा खगेन्द्रो

बभ्राम सोऽप्यवसरं प्रसमीक्षमाणः॥ २५

taṃ jihvayā dviśikhayā parilelihānaṃ

dve sṛkkiṇī hyatikarālaviṣāgnidṛṣṭim|

krīḍannamuṃ parisasāra yathā khagendro

babhrāma so'pyavasaraṃ prasamīkṣamāṇaḥ|| 25

अर्थ

उस समय कालिय नाग अपनी दुहरी जीभ लपलपाकर अपने होठोंके दोनों किनारोंको चाट रहा था और अपनी कराल आँखोंसे विषकी ज्वाला उगलता जा रहा था। अपने वाहन गरुड़के समान भगवान् श्रीकृष्ण उसके साथ खेलते हुए पैंतरा बदलने लगे और वह साँप भी उनपर चोट करनेका दाँव देखता हुआ पैंतरा बदलने लगा॥ २५॥✎ 1983 2076

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1983 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): पैंरोंकी → पैरोंकी
  • #2076 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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