श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.16.1

दशम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

अथ षोडशोऽध्यायः

कालियपर कृपा

श्रीशुक उवाच

विलोक्य दूषितां कृष्णां कृष्णः कृष्णाहिना विभुः।

तस्या विशुद्धिमन्विच्छन् सर्पं तमुदवासयत्॥ १

vilokya dūṣitāṃ kṛṣṇāṃ kṛṣṇaḥ kṛṣṇāhinā vibhuḥ|

tasyā viśuddhimanvicchan sarpaṃ tamudavāsayat|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि महाविषधर कालिय नागने यमुनाजीका जल विषैला कर दिया है। तब यमुनाजीको शुद्ध करनेके विचारसे उन्होंने वहाँसे उस सर्पको निकाल दिया॥ १॥

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