श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.15.42

दशम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

तं गोरजश्छुरितकुन्तलबद्धबर्ह-

वन्यप्रसूनरुचिरेक्षणचारुहासम्।

वेणुं क्वणन्तमनुगैरनुगीतकीर्तिं

गोप्यो दिदृक्षितदृशोऽभ्यगमन् समेताः॥ ४२

taṃ gorajaśchuritakuntalabaddhabarha-

vanyaprasūnarucirekṣaṇacāruhāsam|

veṇuṃ kvaṇantamanugairanugītakīrtiṃ

gopyo didṛkṣitadṛśo'bhyagaman sametāḥ|| 42

अर्थ

उस समय श्रीकृष्णकी घुँघराली अलकोंपर गौओंके खुरोंसे उड़-उड़कर धूलि पड़ी हुई थी, सिरपर मोरपंखका मुकुट था और बालोंमें सुन्दर-सुन्दर जंगली पुष्प गुँथे हुए थे। उनके नेत्रोंमें मधुर चितवन और मुखपर मनोहर मुसकान थी। वे मधुर-मधुर मुरली बजा रहे थे और साथी ग्वालबाल उनकी ललित कीर्तिका गान कर रहे थे। वंशीकी ध्वनि सुनकर बहुत-सी गोपियाँ एक साथ ही व्रजसे बाहर निकल आयीं। उनकी आँखें न जाने कबसे श्रीकृष्णके दर्शनके लिये तरस रही थीं॥ ४२॥

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