श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.15.26

दशम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

प्रयच्छ तानि नः कृष्ण गन्धलोभितचेतसाम्।

वाञ्छास्ति महती राम गम्यतां यदि रोचते॥ २६

prayaccha tāni naḥ kṛṣṇa gandhalobhitacetasām|

vāñchāsti mahatī rāma gamyatāṃ yadi rocate|| 26

अर्थ

श्रीकृष्ण! उनकी सुगन्धसे हमारा मन मोहित हो गया है और उन्हें पानेके लिये मचल रहा है। तुम हमें वे फल अवश्य खिलाओ। दाऊ दादा! हमें उन फलोंकी बड़ी उत्कट अभिलाषा है। आपको रुचे तो वहाँ अवश्य चलिये॥ २६॥

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