॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.15.2
तन्माधवो वेणुमुदीरयन् वृतो
गोपैर्गृणद्भिः स्वयशो बलान्वितः।
पशून् पुरस्कृत्य पशव्यमाविशद्
विहर्तुकामः कुसुमाकरं वनम्॥ २
tanmādhavo veṇumudīrayan vṛto
gopairgṛṇadbhiḥ svayaśo balānvitaḥ|
paśūn puraskṛtya paśavyamāviśad
vihartukāmaḥ kusumākaraṃ vanam|| 2
अर्थ
यह वन गौओंके लिये हरी-हरी घाससे युक्त एवं रंग-बिरंगे पुष्पोंकी खान हो रहा था। आगे-आगे गौएँ, उनके पीछे-पीछे बाँसुरी बजाते हुए श्यामसुन्दर, तदनन्तर बलराम और फिर श्रीकृष्णके यशका गान करते हुए ग्वालबाल—इस प्रकार विहार करनेके लिये उन्होंने उस वनमें प्रवेश किया॥ २॥