श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.15.11

दशम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

क्वचिच्च कलहंसानामनुकूजति कूजितम्।

अभिनृत्यति नृत्यन्तं बर्हिणं हासयन् क्‍वचित्॥ ११

kvacicca kalahaṃsānāmanukūjati kūjitam|

abhinṛtyati nṛtyantaṃ barhiṇaṃ hāsayan kvacit|| 11

अर्थ

कभी-कभी श्रीकृष्ण कूजते हुए राजहंसोंके साथ स्वयं भी कूजने लगते हैं और कभी नाचते हुए मोरोंके साथ स्वयं भी ठुमुक-ठुमुक नाचने लगते हैं और ऐसा नाचते हैं कि मयूरको उपहासास्पद बना देते हैं॥ ११॥

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