॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.14.60
एतत् सुहृद्भिश्चरितं मुरारे-
रघार्दनं शाद्वलजेमनं च।
व्यक्तेतरद् रूपमजोर्वभिष्टवं
शृण्वन् गृणन्नेति नरोऽखिलार्थान्॥ ६०
etat suhṛdbhiścaritaṃ murāre-
raghārdanaṃ śādvalajemanaṃ ca|
vyaktetarad rūpamajorvabhiṣṭavaṃ
śṛṇvan gṛṇanneti naro'khilārthān|| 60
अर्थ
भगवान् श्रीकृष्णकी ग्वालबालोंके साथ वनक्रीड़ा, अघासुरको मारना, हरी-हरी घाससे युक्त भूमिपर बैठकर भोजन करना, अप्राकृतरूपधारी बछड़ों और ग्वालबालोंका प्रकट होना और ब्रह्माजीके द्वारा की हुई इस महान् स्तुतिको जो मनुष्य सुनता और कहता है—उस-उसको धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी प्राप्ति हो जाती है॥ ६०॥