श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.14.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

पुरेह भूमन् बहवोऽपि योगिन-

स्त्वदर्पितेहा निजकर्मलब्धया।

विबुध्य भक्त्यैव कथोपनीतया

प्रपेदिरेऽञ्जोऽच्युत ते गतिं पराम्॥ ५

pureha bhūman bahavo'pi yogina-

stvadarpitehā nijakarmalabdhayā|

vibudhya bhaktyaiva kathopanītayā

prapedire'ñjo'cyuta te gatiṃ parām|| 5

अर्थ

हे अच्युत! हे अनन्त! इस लोकमें पहले भी बहुत-से योगी हो गये हैं। जब उन्हें योगादिके द्वारा आपकी प्राप्ति न हुई, तब उन्होंने अपने लौकिक और वैदिक समस्त कर्म आपके चरणोंमें समर्पित कर दिये। उन समर्पित कर्मोंसे तथा आपकी लीला-कथासे उन्हें आपकी भक्ति प्राप्त हुई। उस भक्तिसे ही आपके स्वरूपका ज्ञान प्राप्त करके उन्होंने बड़ी सुगमतासे आपके परमपदकी प्राप्ति कर ली॥ ५॥

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