जगत्के सभी जीव उसी मायासे मोहित होकर शास्त्र और आचार्योंके बार-बार समझानेपर भी अपने आत्माको निरन्तर भूले हुए हैं। वास्तवमें उस मायाकी ऐसी ही शक्ति है। भला, उससे मोहित होकर जीव यहाँ क्या-क्या नहीं भूल जाते हैं?॥ ४४॥
किं किं न विस्मरन्तीह मायामोहितचेतसः।
यन्मोहितं जगत् सर्वमभीक्ष्णं विस्मृतात्मकम्॥ ४४
जगत्के सभी जीव उसी मायासे मोहित होकर शास्त्र और आचार्योंके बार-बार समझानेपर भी अपने आत्माको निरन्तर भूले हुए हैं। वास्तवमें उस मायाकी ऐसी ही शक्ति है। भला, उससे मोहित होकर जीव यहाँ क्या-क्या नहीं भूल जाते हैं?॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.14.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 228) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/14/44/