श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.14.44

दशम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

किं किं न विस्मरन्तीह मायामोहितचेतसः।

यन्मोहितं जगत् सर्वमभीक्ष्णं विस्मृतात्मकम्॥ ४४

kiṃ kiṃ na vismarantīha māyāmohitacetasaḥ|

yanmohitaṃ jagat sarvamabhīkṣṇaṃ vismṛtātmakam|| 44

अर्थ

जगत‍्के सभी जीव उसी मायासे मोहित होकर शास्त्र और आचार्योंके बार-बार समझानेपर भी अपने आत्माको निरन्तर भूले हुए हैं। वास्तवमें उस मायाकी ऐसी ही शक्ति है। भला, उससे मोहित होकर जीव यहाँ क्या-क्या नहीं भूल जाते हैं?॥ ४४॥

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