श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.14.27

दशम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

त्वामात्मानं परं मत्वा परमात्मानमेव च।

आत्मा पुनर्बहिर्मृग्य अहोऽज्ञजनताज्ञता॥ २७

tvāmātmānaṃ paraṃ matvā paramātmānameva ca|

ātmā punarbahirmṛgya aho'jñajanatājñatā|| 27

अर्थ

भगवन्! कितने आश्‍चर्यकी बात है कि आप हैं अपने आत्मा, पर लोग आपको पराया मानते हैं। और शरीर आदि हैं पराये, किन्तु उनको आत्मा मान बैठते हैं। और इसके बाद आपको कहीं अलग ढूँढ़ने लगते हैं। भला, अज्ञानी जीवोंका यह कितना बड़ा अज्ञान है॥ २७॥

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