॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.14.22
तस्मादिदं जगदशेषमसत्स्वरूपं
स्वप्नाभमस्तधिषणं पुरुदुःखदुःखम्।
त्वय्येव नित्यसुखबोधतनावनन्ते
मायात उद्यदपि यत् सदिवावभाति॥ २२
tasmādidaṃ jagadaśeṣamasatsvarūpaṃ
svapnābhamastadhiṣaṇaṃ puruduḥkhaduḥkham|
tvayyeva nityasukhabodhatanāvanante
māyāta udyadapi yat sadivāvabhāti|| 22
अर्थ
इसलिये यह सम्पूर्ण जगत् स्वप्नके समान असत्य, अज्ञानरूप और दुःख-पर-दुःख देनेवाला है। आप परमानन्द, परम ज्ञानस्वरूप एवं अनन्त हैं। यह मायासे उत्पन्न एवं विलीन होनेपर भी आपमें आपकी सत्तासे सत्यके समान प्रतीत होता है॥ २२॥