श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.14.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

अस्यापि देव वपुषो मदनुग्रहस्य

स्वेच्छामयस्य न तु भूतमयस्य कोऽपि।

नेशे महि त्ववसितुं मनसाऽऽन्तरेण

साक्षात्तवैव किमुतात्मसुखानुभूतेः॥ २

asyāpi deva vapuṣo madanugrahasya

svecchāmayasya na tu bhūtamayasya ko'pi|

neśe mahi tvavasituṃ manasā''ntareṇa

sākṣāttavaiva kimutātmasukhānubhūteḥ|| 2

अर्थ

स्वयंप्रकाश परमात्मन्! आपका यह श्रीविग्रह भक्तजनोंकी लालसा-अभिलाषा पूर्ण करनेवाला है। यह आपकी चिन्मयी इच्छाका मूर्तिमान् स्वरूप मुझपर आपका साक्षात् कृपा-प्रसाद है। मुझे अनुगृहीत करनेके लिये ही आपने इसे प्रकट किया है। कौन कहता है कि यह पंचभूतोंकी रचना है? प्रभो! यह तो अप्राकृत शुद्ध सत्त्वमय है। मैं या और कोई समाधि लगाकर भी आपके इस सच्चिदानन्द-विग्रहकी महिमा नहीं जान सकता। फिर आत्मा-नन्दानुभवस्वरूप साक्षात् आपकी ही महिमाको तो कोई एकाग्रमनसे भी कैसे जान सकता है॥ २॥✎ 1931

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1931 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): स्वयं-प्रकाश → स्वयंप्रकाश

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