श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.14.11

दशम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

क्वाहं तमोमहदहंखचराग्‍निवार्भू-

संवेष्टिताण्डघटसप्तवितस्तिकायः।

क्वेदृग्विधाविगणिताण्डपराणुचर्या-

वाताध्वरोमविवरस्य च ते महित्वम्॥ ११

kvāhaṃ tamomahadahaṃkhacarāgnivārbhū-

saṃveṣṭitāṇḍaghaṭasaptavitastikāyaḥ|

kvedṛgvidhāvigaṇitāṇḍaparāṇucaryā-

vātādhvaromavivarasya ca te mahitvam|| 11

अर्थ

मेरे स्वामी! प्रकृति, महत्तत्त्व, अहंकार, आकाश, वायु, अग्‍नि, जल और पृथ्वीरूप आवरणोंसे घिरा हुआ यह ब्रह्माण्ड ही मेरा शरीर है। और आपके एक-एक रोमके छिद्रमें ऐसे-ऐसे अगणित ब्रह्माण्ड उसी प्रकार उड़ते-पड़ते रहते हैं, जैसे झरोखेकी जालीमेंसे आनेवाली सूर्यकी किरणोंमें रजके छोटे-छोटे परमाणु उड़ते हुए दिखायी पड़ते हैं। कहाँ अपने परिमाणसे साढ़े तीन हाथके शरीरवाला अत्यन्त क्षुद्र मैं, और कहाँ आपकी अनन्त महिमा॥ ११॥

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