॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.13.53
कालस्वभावसंस्कारकामकर्मगुणादिभिः।
स्वमहिध्वस्तमहिभिर्मूर्तिमद्भिरुपासिताः॥ ५३
kālasvabhāvasaṃskārakāmakarmaguṇādibhiḥ|
svamahidhvastamahibhirmūrtimadbhirupāsitāḥ|| 53
अर्थ
प्रकृतिमें क्षोभ उत्पन्न करनेवाला काल, उसके परिणामका कारण स्वभाव, वासनाओंको जगानेवाला संस्कार, कामनाएँ, कर्म, विषय और फल—सभी मूर्तिमान् होकर भगवान्के प्रत्येक रूपकी उपासना कर रहे हैं। भगवान्की सत्ता और महत्ताके सामने उन सभीकी सत्ता और महत्ता अपना अस्तित्व खो बैठी थी॥ ५३॥✎ 1925