ब्रह्माजीने यह भी देखा कि उन्हींके-जैसे दूसरे ब्रह्मासे लेकर तृणतक सभी चराचर जीव मूर्तिमान् होकर नाचते-गाते अनेक प्रकारकी पूजा-सामग्रीसे अलग-अलग भगवान्के उन सब रूपोंकी उपासना कर रहे हैं॥ ५१॥✎ 1661
आत्मादिस्तम्बपर्यन्तैर्मूर्तिमद्भिश्चराचरैः ।
नृत्यगीताद्यनेकार्हैः पृथक् पृथगुपासिताः॥ ५१
ब्रह्माजीने यह भी देखा कि उन्हींके-जैसे दूसरे ब्रह्मासे लेकर तृणतक सभी चराचर जीव मूर्तिमान् होकर नाचते-गाते अनेक प्रकारकी पूजा-सामग्रीसे अलग-अलग भगवान्के उन सब रूपोंकी उपासना कर रहे हैं॥ ५१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.13.51 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 217) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/13/51/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)