श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.47

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

चतुर्भुजाः शंखचक्रगदाराजीवपाणयः।

किरीटिनः कुण्डलिनो हारिणो वनमालिनः॥ ४७

caturbhujāḥ śaṃkhacakragadārājīvapāṇayaḥ|

kirīṭinaḥ kuṇḍalino hāriṇo vanamālinaḥ|| 47

अर्थ

ब्रह्माजी विचार कर ही रहे थे कि उनके देखते-देखते उसी क्षण सभी ग्वालबाल और बछड़े श्रीकृष्णके रूपमें दिखायी पड़ने लगे। सब-के-सब सजल जलधरके समान श्यामवर्ण, पीताम्बरधारी, शंख, चक्र, गदा और पद्मसे युक्त—चतुर्भुज। सबके सिरपर मुकुट, कानोंमें कुण्डल और कण्ठोंमें मनोहर हार तथा वनमालाएँ शोभायमान हो रही थीं॥ ४६-४७॥✎ 1661

यह अर्थ श्लोक 46–47 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1661 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: भक्त-जनोंके → भक्तजनोंके

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