श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.44

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

एवं सम्मोहयन् विष्णुं विमोहं विश्‍वमोहनम्।

स्वयैव माययाजोऽपि स्वयमेव विमोहितः॥ ४४

evaṃ sammohayan viṣṇuṃ vimohaṃ viśvamohanam|

svayaiva māyayājo'pi svayameva vimohitaḥ|| 44

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णकी मायामें तो सभी मुग्ध हो रहे हैं, परन्तु कोई भी माया-मोह भगवान्‌का स्पर्श नहीं कर सकता। ब्रह्माजी उन्हीं भगवान् श्रीकृष्णको अपनी मायासे मोहित करने चले थे। किन्तु उनको मोहित करना तो दूर रहा, वे अजन्मा होनेपर भी अपनी ही मायासे अपने-आप मोहित हो गये॥ ४४॥

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