श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.39

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

नैते सुरेशा ऋषयो न चैते

त्वमेव भासीश भिदाश्रयेऽपि।

सर्वं पृथक्त्वं निगमात् कथं वदे-

त्युक्तेन वृत्तं प्रभुणा बलोऽवैत्॥ ३९

naite sureśā ṛṣayo na caite

tvameva bhāsīśa bhidāśraye'pi|

sarvaṃ pṛthaktvaṃ nigamāt kathaṃ vade-

tyuktena vṛttaṃ prabhuṇā balo'vait|| 39

अर्थ

तब उन्होंने श्रीकृष्णसे कहा—‘भगवन्! ये ग्वालबाल और बछड़े न देवता हैं और न तो कोई ऋषि ही। इन भिन्‍न-भिन्‍न रूपोंका आश्रय लेनेपर भी आप अकेले ही इन रूपोंमें प्रकाशित हो रहे हैं। कृपया स्पष्ट करके थोड़ेमें ही यह बतला दीजिये कि आप इस प्रकार बछड़े, बालक, सिंगी, रस्सी आदिके रूपमें अलग-अलग क्यों प्रकाशित हो रहे हैं?’ तब भगवान्‌ने ब्रह्माकी सारी करतूत सुनायी और बलरामजीने सब बातें जान लीं॥ ३९॥

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