श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.12.43

दशम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

वयं धन्यतमा लोके गुरोऽपि क्षत्रबन्धवः।

यत् पिबामो मुहुस्त्वत्तः पुण्यं कृष्णकथामृतम्॥ ४३

vayaṃ dhanyatamā loke guro'pi kṣatrabandhavaḥ|

yat pibāmo muhustvattaḥ puṇyaṃ kṛṣṇakathāmṛtam|| 43

अर्थ

गुरुदेव! यद्यपि क्षत्रियोचित धर्म ब्राह्मणसेवासे विमुख होनेके कारण मैं अपराधी नाममात्रका क्षत्रिय हूँ, तथापि हमारा अहोभाग्य है कि हम आपके मुखारविन्दसे निरन्तर झरते हुए परम पवित्र मधुमय श्रीकृष्णलीलामृतका बार-बार पान कर रहे हैं॥ ४३॥

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