गुरुदेव! यद्यपि क्षत्रियोचित धर्म ब्राह्मणसेवासे विमुख होनेके कारण मैं अपराधी नाममात्रका क्षत्रिय हूँ, तथापि हमारा अहोभाग्य है कि हम आपके मुखारविन्दसे निरन्तर झरते हुए परम पवित्र मधुमय श्रीकृष्णलीलामृतका बार-बार पान कर रहे हैं॥ ४३॥
वयं धन्यतमा लोके गुरोऽपि क्षत्रबन्धवः।
यत् पिबामो मुहुस्त्वत्तः पुण्यं कृष्णकथामृतम्॥ ४३
गुरुदेव! यद्यपि क्षत्रियोचित धर्म ब्राह्मणसेवासे विमुख होनेके कारण मैं अपराधी नाममात्रका क्षत्रिय हूँ, तथापि हमारा अहोभाग्य है कि हम आपके मुखारविन्दसे निरन्तर झरते हुए परम पवित्र मधुमय श्रीकृष्णलीलामृतका बार-बार पान कर रहे हैं॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.12.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 210) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/12/43/