परीक्षित्! जब वृन्दावनमें अजगरका वह चाम सूख गया, तब वह व्रजवासियोंके लिये बहुत दिनोंतक खेलनेकी एक अद्भुत गुफा-सी बना रहा॥ ३६॥✎ 1659
राजन्नाजगरं चर्म शुष्कं वृन्दावनेऽद्भुतम्।
व्रजौकसां बहुतिथं बभूवाक्रीडगह्वरम्॥ ३६
परीक्षित्! जब वृन्दावनमें अजगरका वह चाम सूख गया, तब वह व्रजवासियोंके लिये बहुत दिनोंतक खेलनेकी एक अद्भुत गुफा-सी बना रहा॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.12.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 208) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/12/36/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)