श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.12.13

दशम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

अथाघनामाभ्यपतन्महासुर-

स्तेषां सुखक्रीडनवीक्षणाक्षमः।

नित्यं यदन्तर्निजजीवितेप्सुभिः

पीतामृतैरप्यमरैः प्रतीक्ष्यते॥ १३

athāghanāmābhyapatanmahāsura-

steṣāṃ sukhakrīḍanavīkṣaṇākṣamaḥ|

nityaṃ yadantarnijajīvitepsubhiḥ

pītāmṛtairapyamaraiḥ pratīkṣyate|| 13

अर्थ

परीक्षित्! इसी समय अघासुर नामका महान् दैत्य आ धमका। उससे श्रीकृष्ण और ग्वालबालोंकी सुखमयी क्रीडा देखी न गयी। उसके हृदयमें जलन होने लगी। वह इतना भयंकर था कि अमृतपान करके अमर हुए देवता भी उससे अपने जीवनकी रक्षा करनेके लिये चिन्तित रहा करते थे और इस बातकी बाट देखते रहते थे कि किसी प्रकारसे इसकी मृत्युका अवसर आ जाय॥ १३॥

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