वे आपसमें कहने लगे—‘हाय! हाय!! यह कितने आश्चर्यकी बात है। इस बालकको कई बार मृत्युके मुँहमें जाना पड़ा। परन्तु जिन्होंने इसका अनिष्ट करना चाहा, उन्हींका अनिष्ट हुआ। क्योंकि उन्होंने पहलेसे दूसरोंका अनिष्ट किया था॥ ५५॥
अहो बतास्य बालस्य बहवो मृत्यवोऽभवन्।
अप्यासीद् विप्रियं तेषां कृतं पूर्वं यतो भयम्॥ ५५
वे आपसमें कहने लगे—‘हाय! हाय!! यह कितने आश्चर्यकी बात है। इस बालकको कई बार मृत्युके मुँहमें जाना पड़ा। परन्तु जिन्होंने इसका अनिष्ट करना चाहा, उन्हींका अनिष्ट हुआ। क्योंकि उन्होंने पहलेसे दूसरोंका अनिष्ट किया था॥ ५५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.11.55 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 202) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/11/55/