यह देखकर ग्वालबालोंके आश्चर्यकी सीमा न रही। वे ‘वाह-वाह’ करके प्यारे कन्हैयाकी प्रशंसा करने लगे। देवता भी बड़े आनन्दसे फूलोंकी वर्षा करने लगे॥ ४४॥
तं वीक्ष्य विस्मिता बालाः शशंसुः साधु साध्विति।
देवाश्च परिसन्तुष्टा बभूवुः पुष्पवर्षिणः॥ ४४
यह देखकर ग्वालबालोंके आश्चर्यकी सीमा न रही। वे ‘वाह-वाह’ करके प्यारे कन्हैयाकी प्रशंसा करने लगे। देवता भी बड़े आनन्दसे फूलोंकी वर्षा करने लगे॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.11.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 201) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/11/44/