श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.11.1

दशम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

अथैकादशोऽध्यायः

गोकुलसे वृन्दावन जाना तथा वत्सासुर और बकासुरका उद्धार

श्रीशुक उवाच

गोपा नन्दादयः श्रुत्वा द्रुमयोः पततो रवम्।

तत्राजग्मुः कुरुश्रेष्ठ निर्घातभयशंकिताः॥ १

gopā nandādayaḥ śrutvā drumayoḥ patato ravam|

tatrājagmuḥ kuruśreṣṭha nirghātabhayaśaṃkitāḥ|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! वृक्षोंके गिरनेसे जो भयंकर शब्द हुआ था, उसे नन्दबाबा आदि गोपोंने भी सुना। उनके मनमें यह शंका हुई कि कहीं बिजली तो नहीं गिरी! सब-के-सब भयभीत होकर वृक्षोंके पास आ गये॥ १॥

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