श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.10.31

दशम स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

त्वं महान् प्रकृतिः सूक्ष्मा रजःसत्त्वतमोमयी।

त्वमेव पुरुषोऽध्यक्षः सर्वक्षेत्रविकारवित्॥ ३१

tvaṃ mahān prakṛtiḥ sūkṣmā rajaḥsattvatamomayī|

tvameva puruṣo'dhyakṣaḥ sarvakṣetravikāravit|| 31

अर्थ

आप ही महत्तत्त्व और वह प्रकृति हैं, जो अत्यन्त सूक्ष्म एवं सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुणरूपा है। आप ही समस्त स्थूल और सूक्ष्म शरीरोंके कर्म, भाव, धर्म और सत्ताको जाननेवाले सबके साक्षी परमात्मा हैं॥ ३१॥

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