॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.1.65
ऋषेर्विनिर्गमे कंसो यदून् मत्वा सुरानिति।
देवक्या गर्भसम्भूतं विष्णुं च स्ववधं प्रति॥ ६५
ṛṣervinirgame kaṃso yadūn matvā surāniti|
devakyā garbhasambhūtaṃ viṣṇuṃ ca svavadhaṃ prati|| 65
अर्थ
जब देवर्षि नारद इतना कहकर चले गये, तब कंसको यह निश्चय हो गया कि यदुवंशी देवता हैं और देवकीके गर्भसे विष्णुभगवान् ही मुझे मारनेके लिये पैदा होनेवाले हैं। इसलिये उसने देवकी और वसुदेवको हथकड़ी-बेड़ीसे जकड़कर कैदमें डाल दिया और उन दोनोंसे जो-जो पुत्र होते गये, उन्हें वह मारता गया। उसे हर बार यह शंका बनी रहती कि कहीं विष्णु ही उस बालकके रूपमें न आ गया हो॥ ६५-६६॥