श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.1.63

दशम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

सर्वे वै देवताप्राया उभयोरपि भारत।

ज्ञातयो बन्धुसुहृदो ये च कंसमनुव्रताः॥ ६३

sarve vai devatāprāyā ubhayorapi bhārata|

jñātayo bandhusuhṛdo ye ca kaṃsamanuvratāḥ|| 63

अर्थ

परीक्षित्! इधर भगवान् नारद कंसके पास आये और उससे बोले कि ‘कंस! व्रजमें रहनेवाले नन्द आदि गोप, उनकी स्त्रियाँ, वसुदेव आदि वृष्णिवंशी यादव, देवकी आदि यदुवंशकी स्त्रियाँ और नन्द, वसुदेव दोनोंके सजातीय बन्धु-बान्धव और सगे-सम्बन्धी—सब-के-सब देवता हैं; जो इस समय तुम्हारी सेवा कर रहे हैं, वे भी देवता ही हैं।’ उन्होंने यह भी बतलाया कि ‘दैत्योंके कारण पृथ्वीका भार बढ़ गया है, इसलिये देवताओंकी ओरसे अब उनके वधकी तैयारी की जा रही है’॥ ६२—६४॥

यह अर्थ श्लोक 62–64 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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