वसुदेवजीने कहा—‘ठीक है’ और उस बालकको लेकर वे लौट आये। परन्तु उन्हें मालूम था कि कंस बड़ा दुष्ट है और उसका मन उसके हाथमें नहीं है। वह किसी क्षण बदल सकता है। इसलिये उन्होंने उसकी बातपर विश्वास नहीं किया॥ ६१॥
तथेति सुतमादाय ययावानकदुन्दुभिः।
नाभ्यनन्दत तद्वाक्यमसतोऽविजितात्मनः॥ ६१
वसुदेवजीने कहा—‘ठीक है’ और उस बालकको लेकर वे लौट आये। परन्तु उन्हें मालूम था कि कंस बड़ा दुष्ट है और उसका मन उसके हाथमें नहीं है। वह किसी क्षण बदल सकता है। इसलिये उन्होंने उसकी बातपर विश्वास नहीं किया॥ ६१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.1.61 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 127) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/61/