श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.1.33

दशम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

शंखतूर्यमृदंगाश्‍च नेदुर्दुन्दुभयः समम्।

प्रयाणप्रक्रमे तावद् वरवध्वोः सुमंगलम्॥ ३३

śaṃkhatūryamṛdaṃgāśca nedurdundubhayaḥ samam|

prayāṇaprakrame tāvad varavadhvoḥ sumaṃgalam|| 33

अर्थ

विदाईके समय वर-वधूके मंगलके लिये एक ही साथ शंख, तुरही, मृदंग और दुन्दुभियाँ बजने लगीं॥ ३३॥✎ 882 1651

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #882 शब्दोंके बीचका स्थान: ३५॥वह → ३५॥ वह
  • #1651 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: वस्त्रा-भूषणोंसे → वस्त्राभूषणोंसे

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