विदाईके समय वर-वधूके मंगलके लिये एक ही साथ शंख, तुरही, मृदंग और दुन्दुभियाँ बजने लगीं॥ ३३॥✎ 8821651
शंखतूर्यमृदंगाश्च नेदुर्दुन्दुभयः समम्।
प्रयाणप्रक्रमे तावद् वरवध्वोः सुमंगलम्॥ ३३
विदाईके समय वर-वधूके मंगलके लिये एक ही साथ शंख, तुरही, मृदंग और दुन्दुभियाँ बजने लगीं॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.1.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 123) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/1/33/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)