उग्रसेनका लड़का था कंस। उसने अपनी चचेरी बहिन देवकीको प्रसन्न करनेके लिये उसके रथके घोड़ोंकी रास पकड़ ली। वह स्वयं ही रथ हाँकने लगा, यद्यपि उसके साथ सैकड़ों सोनेके बने हुए रथ चल रहे थे॥ ३०॥✎ 8821651
उग्रसेनसुतः कंसः स्वसुः प्रियचिकीर्षया।
रश्मीन् हयानां जग्राह रौक्मै रथशतैर्वृतः॥ ३०
उग्रसेनका लड़का था कंस। उसने अपनी चचेरी बहिन देवकीको प्रसन्न करनेके लिये उसके रथके घोड़ोंकी रास पकड़ ली। वह स्वयं ही रथ हाँकने लगा, यद्यपि उसके साथ सैकड़ों सोनेके बने हुए रथ चल रहे थे॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.1.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 123) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/30/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)