श्रीशुकदेवजीने कहा—भगवान्के लीला-रसके रसिक राजर्षे! तुमने जो कुछ निश्चय किया है, वह बहुत ही सुन्दर और आदरणीय है; क्योंकि सबके हृदयाराध्य श्रीकृष्णकी लीला-कथा श्रवण करनेमें तुम्हें सहज एवं सुदृढ़ प्रीति प्राप्त हो गयी है॥ १५॥
सम्यग्व्यवसिता बुद्धिस्तव राजर्षिसत्तम।
वासुदेवकथायां ते यज्जाता नैष्ठिकी रतिः॥ १५
श्रीशुकदेवजीने कहा—भगवान्के लीला-रसके रसिक राजर्षे! तुमने जो कुछ निश्चय किया है, वह बहुत ही सुन्दर और आदरणीय है; क्योंकि सबके हृदयाराध्य श्रीकृष्णकी लीला-कथा श्रवण करनेमें तुम्हें सहज एवं सुदृढ़ प्रीति प्राप्त हो गयी है॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.1.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 121) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/15/