श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.1.13

दशम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

नैषातिदुःसहा क्षुन्मां त्यक्तोदमपि बाधते।

पिबन्तं त्वन्मुखाम्भोजच्युतं हरिकथामृतम्॥ १३

naiṣātiduḥsahā kṣunmāṃ tyaktodamapi bādhate|

pibantaṃ tvanmukhāmbhojacyutaṃ harikathāmṛtam|| 13

अर्थ

भगवन्! अन्‍नकी तो बात ही क्या, मैंने जलका भी परित्याग कर दिया है। फिर भी वह असह्य भूख-प्यास (जिसके कारण मैंने मुनिके गलेमें मृत सर्प डालनेका अन्याय किया था) मुझे तनिक भी नहीं सता रही है; क्योंकि मैं आपके मुखकमलसे झरती हुई भगवान्‌की सुधामयी लीला-कथाका पान कर रहा हूँ॥ १३॥

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