श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.9.41

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

मुनिगणनृपवर्यसंकुलेऽन्तःसदसि युधिष्ठिरराजसूय एषाम्।✎ 1518

अर्हणमुपपेद ईक्षणीयो मम दृशिगोचर एष आविरात्मा॥ ४१

munigaṇanṛpavaryasaṃkule'ntaḥsadasi yudhiṣṭhirarājasūya eṣām|

arhaṇamupapeda īkṣaṇīyo mama dṛśigocara eṣa āvirātmā|| 41

अर्थ

जिस समय युधिष्ठिरका राजसूययज्ञ हो रहा था, मुनियों और बड़े-बड़े राजाओंसे भरी हुई सभामें सबसे पहले सबकी ओरसे इन्हीं सबके दर्शनीय भगवान् श्रीकृष्णकी मेरी आँखोंके सामने पूजा हुई थी; वे ही सबके आत्मा प्रभु आज इस मृत्युके समय मेरे सामने खड़े हैं॥ ४१॥✎ 1577

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1518 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मुनिगणनृपवर्यसंकुलेऽन्त:- सदसि → मुनिगणनृपवर्यसंकुलेऽन्तःसदसि
  • #1577 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: रूप-से → रूपसे

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें