arhaṇamupapeda īkṣaṇīyo mama dṛśigocara eṣa āvirātmā|| 41
अर्थ
जिस समय युधिष्ठिरका राजसूययज्ञ हो रहा था, मुनियों और बड़े-बड़े राजाओंसे भरी हुई सभामें सबसे पहले सबकी ओरसे इन्हीं सबके दर्शनीय भगवान् श्रीकृष्णकी मेरी आँखोंके सामने पूजा हुई थी; वे ही सबके आत्मा प्रभु आज इस मृत्युके समय मेरे सामने खड़े हैं॥ ४१॥✎ 1577
मुनिगणनृपवर्यसंकुलेऽन्तःसदसि युधिष्ठिरराजसूय एषाम्।
अर्हणमुपपेद ईक्षणीयो मम दृशिगोचर एष आविरात्मा॥ ४१
जिस समय युधिष्ठिरका राजसूययज्ञ हो रहा था, मुनियों और बड़े-बड़े राजाओंसे भरी हुई सभामें सबसे पहले सबकी ओरसे इन्हीं सबके दर्शनीय भगवान् श्रीकृष्णकी मेरी आँखोंके सामने पूजा हुई थी; वे ही सबके आत्मा प्रभु आज इस मृत्युके समय मेरे सामने खड़े हैं॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.9.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 124) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/9/41/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)