श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.9.31

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

विशुद्धया धारणया ह२ताशुभस्तदीक्षयैवाशु गतायुधव्यथः।✎ 1509

निवृत्तसर्वेन्द्रियवृत्तिविभ्रमस्तुष्टाव जन्यं विसृजञ्जनार्दनम्॥ ३१✎ 1510

viśuddhayā dhāraṇayā hatāśubhastadīkṣayaivāśu gatāyudhavyathaḥ|

nivṛttasarvendriyavṛttivibhramastuṣṭāva janyaṃ visṛjañjanārdanam|| 31

अर्थ

उनको शस्त्रोंकी चोटसे जो पीड़ा हो रही थी वह तो भगवान्‌के दर्शनमात्रसे ही तुरंत दूर हो गयी तथा भगवान्‌की विशुद्ध धारणासे उनके जो कुछ अशुभ शेष थे वे सभी नष्ट हो गये। अब शरीर छोड़नेके समय उन्होंने अपनी समस्त इन्द्रियोंके वृत्तिविलासको रोक दिया और बड़े प्रेमसे भगवान्‌की स्तुति की॥ ३१॥✎ 72 73

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—हृता।

    (मुद्रित पृष्ठ 122)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (4)
  • #72 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #73 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1509 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: ताशुभ- स्तदीक्षयैवाशु → ताशुभस्तदीक्षयैवाशु
  • #1510 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: निवृत्तसर्वेन्द्रियवृत्तिविभ्रम- स्तुष्टाव → निवृत्तसर्वेन्द्रियवृत्तिविभ्रमस्तुष्टाव

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