उनको शस्त्रोंकी चोटसे जो पीड़ा हो रही थी वह तो भगवान्के दर्शनमात्रसे ही तुरंत दूर हो गयी तथा भगवान्की विशुद्ध धारणासे उनके जो कुछ अशुभ शेष थे वे सभी नष्ट हो गये। अब शरीर छोड़नेके समय उन्होंने अपनी समस्त इन्द्रियोंके वृत्तिविलासको रोक दिया और बड़े प्रेमसे भगवान्की स्तुति की॥ ३१॥✎ 7273
विशुद्धया धारणया हताशुभस्तदीक्षयैवाशु गतायुधव्यथः।
निवृत्तसर्वेन्द्रियवृत्तिविभ्रमस्तुष्टाव जन्यं विसृजञ्जनार्दनम्॥ ३१
उनको शस्त्रोंकी चोटसे जो पीड़ा हो रही थी वह तो भगवान्के दर्शनमात्रसे ही तुरंत दूर हो गयी तथा भगवान्की विशुद्ध धारणासे उनके जो कुछ अशुभ शेष थे वे सभी नष्ट हो गये। अब शरीर छोड़नेके समय उन्होंने अपनी समस्त इन्द्रियोंके वृत्तिविलासको रोक दिया और बड़े प्रेमसे भगवान्की स्तुति की॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.9.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 122) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/9/31/