भीष्मपितामह इस प्रकार धर्मका प्रवचन कर ही रहे थे कि वह उत्तरायणका समय आ पहुँचा जिसे मृत्युको अपने अधीन रखनेवाले भगवत्परायण योगीलोग चाहा करते हैं॥ २९॥✎ 7273
धर्मं प्रवदतस्तस्य स कालः प्रत्युपस्थितः।
यो योगिनश्छन्दमृत्योर्वाञ्छितस्तूत्तरायणः॥ २९
भीष्मपितामह इस प्रकार धर्मका प्रवचन कर ही रहे थे कि वह उत्तरायणका समय आ पहुँचा जिसे मृत्युको अपने अधीन रखनेवाले भगवत्परायण योगीलोग चाहा करते हैं॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.9.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 122) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/9/29/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)