सूतजी कहते हैं—युधिष्ठिरने उनकी यह बात सुनकर शरशय्यापर सोये हुए भीष्मपितामहसे बहुत-से ऋषियोंके सामने ही नाना प्रकारके धर्मोंके सम्बन्धमें अनेकों रहस्य पूछे॥ २५॥
युधिष्ठिरस्तदाकर्ण्य शयानं शरपञ्जरे।
अपृच्छद्विविधान्धर्मानृषीणां चानुशृण्वताम्॥ २५
सूतजी कहते हैं—युधिष्ठिरने उनकी यह बात सुनकर शरशय्यापर सोये हुए भीष्मपितामहसे बहुत-से ऋषियोंके सामने ही नाना प्रकारके धर्मोंके सम्बन्धमें अनेकों रहस्य पूछे॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.9.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 121) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/9/25/