श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.9.11

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

पाण्डुपुत्रानुपासीनान् प्रश्रयप्रेमसङ्गतान्१।

अभ्याचष्टानुरागास्रैरन्धीभूतेन चक्षुषा॥ ११

pāṇḍuputrānupāsīnān praśrayapremasaṅgatān|

abhyācaṣṭānurāgāsrairandhībhūtena cakṣuṣā|| 11

अर्थ

पाण्डव बड़े विनय और प्रेमके साथ भीष्मपितामहके पास बैठ गये। उन्हें देखकर भीष्मपितामहकी आँखें प्रेमके आँसुओंसे भर गयीं। उन्होंने उनसे कहा—॥ ११॥✎ 1575

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—सन्‍नतान्।

    (मुद्रित पृष्ठ 120)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1575 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: भीष्म-पितामहके → भीष्मपितामहके

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