श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.8.47

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

आह राजा धर्मसुतश्चिन्तयन् सुहृदां वधम्।

प्राकृतेनात्मना विप्राः स्नेहमोहवशं गतः॥ ४७

āha rājā dharmasutaścintayan suhṛdāṃ vadham|

prākṛtenātmanā viprāḥ snehamohavaśaṃ gataḥ|| 47

अर्थ

शौनकादि ऋषियो! धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरको अपने स्वजनोंके वधसे बड़ी चिन्ता हुई। वे अविवेकयुक्त चित्तसे स्नेह और मोहके वशमें होकर कहने लगे—भला, मुझ दुरात्माके हृदयमें बद्धमूल हुए इस अज्ञानको तो देखो; मैंने सियार-कुत्तोंके आहार इस अनात्मा शरीरके लिये अनेक अक्षौहिणी* सेनाका नाश कर डाला॥ ४७-४८॥✎ 70 71

यह अर्थ श्लोक 47–48 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

टिप्पणियाँ

  1. *

    २१,८७० रथ, २१,८७० हाथी, १,०९,३५० पैदल और ६५,६०० घुड़सवार—इतनी सेनाको अक्षौहिणी कहते हैं। (महाभारत)

    (मुद्रित पृष्ठ 118)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #70 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #71 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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