श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.8.42

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

त्वयि मेऽनन्यविषया मतिर्मधुपतेऽसकृत्।

रतिमुद्वहतादद्धा१ गङ्गेवौघमुदन्वति॥ ४२

tvayi me'nanyaviṣayā matirmadhupate'sakṛt|

ratimudvahatādaddhā gaṅgevaughamudanvati|| 42

अर्थ

श्रीकृष्ण! जैसे गंगाकी अखण्ड धारा समुद्रमें गिरती रहती है, वैसे ही मेरी बुद्धि किसी दूसरी ओर न जाकर आपसे ही निरन्तर प्रेम करती रहे॥ ४२॥✎ 1574

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—रतिमुद्वहतां तद्वत्।

    (मुद्रित पृष्ठ 118)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1574 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अग्‍नि-स्वरूप → अग्‍निस्वरूप

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