जैसे जीवके बिना इन्द्रियाँ शक्तिहीन हो जाती हैं, वैसे ही आपके दर्शन बिना यदुवंशियोंके और हमारे पुत्र पाण्डवोंके नाम तथा रूपका अस्तित्व ही क्या रह जाता है॥ ३८॥✎ 1574
के वयं नामरूपाभ्यां यदुभिः सह पाण्डवाः।
भवतोऽदर्शनं यर्हि हृषीकाणामिवेशितुः॥ ३८
जैसे जीवके बिना इन्द्रियाँ शक्तिहीन हो जाती हैं, वैसे ही आपके दर्शन बिना यदुवंशियोंके और हमारे पुत्र पाण्डवोंके नाम तथा रूपका अस्तित्व ही क्या रह जाता है॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.8.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 117) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/8/38/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)