वहाँ उन सबने मृत बन्धुओंको जलदान दिया और उनके गुणोंका स्मरण करके बहुत विलाप किया। तदनन्तर भगवान्के चरण-कमलोंकी धूलिसे पवित्र गंगाजलमें पुनः स्नान किया॥ २॥
ते निनीयोदकं सर्वे विलप्य च भृशं पुनः।
आप्लुता हरिपादाब्जरजःपूतसरिज्जले॥ २
वहाँ उन सबने मृत बन्धुओंको जलदान दिया और उनके गुणोंका स्मरण करके बहुत विलाप किया। तदनन्तर भगवान्के चरण-कमलोंकी धूलिसे पवित्र गंगाजलमें पुनः स्नान किया॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.8.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 113) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/8/2/