॥ श्रीहरिः ॥
अन्तःस्थः सर्वभूतानामात्मा योगेश्वरो हरिः।
स्वमाययाऽऽवृणोद्गर्भं वैराट्याः कुरुतन्तवे॥ १४
antaḥsthaḥ sarvabhūtānāmātmā yogeśvaro hariḥ|
svamāyayā''vṛṇodgarbhaṃ vairāṭyāḥ kurutantave|| 14
अर्थ
योगेश्वर श्रीकृष्ण समस्त प्राणियोंके हृदयमें विराजमान आत्मा हैं। उन्होंने उत्तराके गर्भको पाण्डवोंकी वंशपरम्परा चलानेके लिये अपनी मायाके कवचसे ढक दिया॥ १४॥
अन्तःस्थः सर्वभूतानामात्मा योगेश्वरो हरिः।
स्वमाययाऽऽवृणोद्गर्भं वैराट्याः कुरुतन्तवे॥ १४
योगेश्वर श्रीकृष्ण समस्त प्राणियोंके हृदयमें विराजमान आत्मा हैं। उन्होंने उत्तराके गर्भको पाण्डवोंकी वंशपरम्परा चलानेके लिये अपनी मायाके कवचसे ढक दिया॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.8.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 114) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/8/14/